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संसद का यह सत्र सरकार की अच्छी खासी मुसिबत

संसद का यह सत्र सरकार की अच्छी खासी मुसिबत

बिहार चुनाव के बाद से ही आसार लगाये जा रहे थे कि इस बार फिर से संसद का सत्र खूब हंगामेदार होने वाला हैं क्योकि जिस तरह बिहार चुनाव मे महागठबंधन ने जीत दर्ज की हैं और जिस तरह श़पथ ग्रहण समारोह मे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सभी विपक्षी दलों के नेता एकत्रित हुए थे उससे विपक्षी एकता का ट्रेलर माना जा रहा हैं और सरकार को घेरने की तैयारी का नमूना भी माना जा रहा हैं । 22 नवम्बर से शुरु हो चुके संसद के सत्र मे सरकार को पहले ही दिन हंगामे का सामना करना पड़ा । पहले सत्र मे संविधान पर चर्चा की गई और असहिष्णुता से शुरु हुई इस बहस मे हमारे राजनेताओ ने हमारे पुराने नेताओ जैसे अम्बेडकर से लेकर इन्दिरा गांधी तक सबको अपनी बहस मे शामिल कर उनका राजनैतिक प्रयोग करने लगे ।

संसद का यह सत्र सरकार का अच्छी खासी मुसिबतो के साथ स्वागत कर रहा हैं । संसद के इस सत्र मे सरकार को कुछ महत्वपूर्ण विधायको को कानूनी जामा पहना हैं । सरकार लोकसभा मे तो अपने विधेयक को कानूनी जामा पहना सकती है लेकिन राज्यसभा मे सरकार को विपक्षी एकता का सामना करना पडेगा । सरकार को इस सत्र मे 8 बिल लोकसभा और 11 राज्यसभा मे पास करना हैं । इसके अलावा सरकार को इस सत्र मे 35 लटके हुए विधेयको को भी पास करना हैं। सरकार को इस सत्र मे अपना महत्वाकांक्षी विधेयक जीएसटी बिल भी पास करना हैं । सरकार चाहती हैं कि यह बिल इस सत्र मे पारित हो जाये ताकि यह विधेयक कानूनी रुप ले ले और इसे 1 अप्रैल 2016 से लागू कर सके लेकिन सरकार की इस योजना पर हंगामे के बादल मंडराते दिख रहे हैं । संसद मे इस समय जिस तरह विपक्ष द्वरा असहिष्णुता का मुद्दा उठाकर हंगामा किया जा रहा है उससे पक्ष व विपक्ष दोनो पर ही सवाल उठ रहे हैं । सरकार व विपक्ष दोनो को संसद की गरिमा समझना चाहिए और सोचना चाहिए जनता ने उन्हे अपने पैसे को हंगामे के लिये प्रयोग करने के लिये नहीं भेजा । संसद में सभी महत्वपूर्ण विषयो पर चर्चा होनी चाहिए और सरकार को विपक्ष का पक्ष सुनना चाहिए तो विपक्ष को भी सरकार का पक्ष सुनना चाहिए ।

जिस तरह हंगामा कर सांसद असहिष्णुता पर चर्चा की बात कर रहे हैं उससे उन पर ही सवाल उठने लगे हैं कि सांसदो द्वारा किया जाने वाला ये हंगामा किस श्रेणी में आता हैं, सहिष्णुता या असहिष्णुता। संसद के पहले सत्र  मे होने वाला हंगामा कुछ सीमा तक टाला जा सकता था। अगर सरकार थोडी़ जागरुकता दिखाती तो । जिस तरह देश में एकाएक असहिष्णुता का मुद्दा उठा और विपक्ष द्वारा पीएम को इस पर बयान देने की मांग की गयी लेकिन तब सरकार ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और अपनी लापरवाही दिखाई पर आखिरकार पीएम साहब को इस पर जवाब देना ही पड़ा पर  जवाब भारत में नहीं विदेश में दिया गया। पीएम साहब ने असहिष्णुता पर देश में न बोलकर विदेश में बोला जब उनसे विदेशी मीडिया ने इस विषय पर सवाल पुछा ऐसे पीएम साहब से सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब भारतीय मीडिया ,जनता और विपक्ष इस मुद्दे पर पीएम का बयान सुनना चाह रही थी तब ही क्यो नही जवाब दे दिया गया । आखिर विदेशी धरती पर विदेशी मीडिया के सामने किरकिरी करा कर क्या मिल? इस जवाब के बाद सवाल विपक्ष पर भी उठ रहे हैं कि जब प्रधानमन्त्री ने इस मुद्दे पर अपनी सफाई दे दी हैं तब इस पर हंगामा करने का क्या औचित्य रह जाता हैं? संसद जो लोकतन्त्र की आस्था का केन्द्र माना जाता हैं उस आस्था के केन्द्र मे अब भारत के पवित्र ग्रन्थ हमारे संविधान पर ही सवाल उठाये जा रहे हैं ।

संसद मे जिस तरह सेक्यूलर शब्द को लेकर विवाद बठ रहा हैं और बहस बाजी हो रही हैं कि यह शब्द सविधान से हटाना चाहिए कि नही। इन सब के बीच जनता के मुद्दे खोते जा रहे हैं । जनता की अनेक समस्याएँ है जिस पर न तो सरकार न ही विपक्ष ध्यान दे रही हैं । दोनो आपसी राजनीति में इस तरह खोय हुए हैं कि वे भूल गये हैं कि पक्ष या विपक्ष से पहले वे जनता के प्रतिनिधि हैं और उन्हे जनता ने अपनी समस्याओ को संसद में उठाने के लिये पहुचाँया हैं न कि बेवजह का हंगामा कर जनता का पैसा बर्बाद करने के लिये । अगर यह सत्र भी मानसून सत्र की तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया तो इससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पडेगा और जनता का संसद के प्रति विश्वास भी डगमगाने लगेगा । पक्ष व विपक्ष को समझना होगा कि जनता ने उन्हे बड़ी उम्मीद से चुनकर भेजा हैं ताकि वे जनहित के कार्य कर सके। 

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