मेरे कुछ दोस्त जो बिहार

नेशनल नौटंकी के नए सीन, नई सीनरी| बिहार

मेरे कुछ दोस्त जो बिहार से दिल से तालुकात रखते है और बिहारी पर होने वाले अत्याचार पर अपना विरोध भी दर्ज़ कराते है, अपने दोस्तों के बीच, अपने मोहल्लों में।
मैंने उनसे यूँही पूछ दिया भाई ये आप लालू जी के टीम को जीत दिला कर और उनके बेटों को मंत्री पद पर बैठा कर जो नवी फेल है क्या आप सबने ठीक किया, क्या लगता है की 15 वर्ष के जंगलराज के बाद ये अब ठीक काम करेंगे।
तो उनलोगो का आप जवाब सुनिए….

“थोड़े गुस्से से बोले-ये क्या नवी फेल, नवी फेल लगा रखा है, आठवीं पास नही कह सकते क्या”?

गाली देना ही है, तो लखनऊ वालो की तरह तश्तरी में परोसकर दो। हाई स्कूल के छिछोरों के लिए हाई स्कूल पास होना जरुरी नही है। अरे भाई, घर में दो-दो पूर्व मुख्यमंत्री है, एक उप-मुख्यमंत्री, एक केबिनेट मंत्री हो, तो पूरी कोठी सचिवालय लगने लगती है। अब और जान ले लोगे क्या? अरे भई, MBA करके भूंजा बेचने से अच्छा है की अंगूठा छाप होके मंत्री पद संभालो।
कबीर, सूरदास, तुलसी कौन MA पास थे जी?
हमने सोचा की बिहार की राजनीति ने इधर शिक्षा को ठेंगा दिखा दिया है। लेकिन ठेंगे के अपने तर्क होते है। इन दिनों एक नया धारवाहिक शुरू हुआ है , ओड-इवन! वे भी नाराज़ हैं, जिन्हें पता नही की सम-विषम को अंग्रेजी में ओड-इवन कहते है।
दिल्ली में प्रदूषण इतना है की फेफड़े ख़राब होने का सबसे ज्यादा खतरा उस आदमी को है, जो रोज़ाना अनुलोम-विलोम करता है। आंकड़ो के मुताबिक, दिल्ली की सांस हिंदी धरवाहिको की सास से ज्यादा ज़हरीली हो चुकी है। इससे परेशान होकर दिल्ली सरकार ने सम-विषम वाला फॉर्मूला लागु कर दिया है। लोगो पर परेशान दिखने का इतना दबाव है की शेयरिंग ऑटो में ड्राईवर के साथ वाली सीट पर लटककर ऑफिस जाने वाले भी फैसले का विरोध कर रहे है। वे लोग भी खून की नदिया बहाने की बात कर रहे है जो रोज़ बहन की स्कूटी से ऑफिस जाते है।

आज कल की समस्या भी अजीबोगरीब ही है, सबसे आम समस्या और दोस्ताना शब्द है सहिष्णु-असहिष्णु जिसने सम्मान वापसी का कारोबार कर इसमें निवेश किया, फ़िल्मी कलाकारों ने महीना भर पहले असहिष्णुता है, बोलकर इसमें दाखिला लिया था, मगर उनके इस बयां के बाद जब लोगो ने उनकी आने वाली फ़िल्म के खिलाफ असहिष्णुता दिखाई, तो उन्हें कहना पड़ा की असहिष्णुता है ही नही उन्हें अपना वाला ही देश पसंद है। सवाल ये भी है की उन्हें ये बोलने से थोड़ा बहुत नुक्सान हुआ नही तो फायदा होता तो अभी तक असहिष्णुता के पालने में वे झूलते रहते। ये आक्रामक शब्द पालना ही हो गई है मन किया तो झूल लिये नही तो किनारे पड़े रहने दो। अब उत्तर प्रदेश की चुनाव भी नज़दीक है, इसलिये बहुत मामला अभी उठने वाला है देखना है भगवन वनवास में ही रहते है या घर भी लौटेंगे।

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