ये कैसा विरोध ?

देश में इस समय पुरस्कार पाने कि खबरों को जितनी अहमियत नही मिल रही है उससे ज्यादा पुरस्कार लौटने कि खबरों को  अहमियत मिल रही है। लेखकों द्वारा एकाएक पुरस्कार लौटने कि तो जैसे बाढ़ आ गयी है। कुछ लेखक तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अभी तक केवल घोषणा ही कि है पुरस्कार लौटाए नही हैं, ऐसे में उनके पुरस्कार लौटने के पीछे की श्रद्धा पर सवाल उठ रहे हैं कि अगर लौटना ही है तो घोषणा के तुरंत बाद क्यों नही लौटा दे रहे हैं। इन सब लेन-देन के बीच में साहित्य अकादमी अलग परेशान है। जिन लोगो ने साहित्य अकादमी का कार्यालय देखा है उन लोगो को ये भली-भांति पता है कि यह संस्था किस प्रकार छोटे से भवन में अपना कार्यालय चला रही है। ऐसे में बेचारी संस्था यह सोच कर परेशान है कि वे इन पुरस्कारों को रखेगी कहाँ ?…….

इन सबसे अलग लेखकों के पुरस्कार लौटने का सिलसिला अभी खत्म हुआ नही लग रहा है। अब तक जिन लेखकों ने यह पुरस्कार लौटाया है उनका कहना है कि वे देश में बढ़ती हिंसा ,साम्प्रदायिकता से दुखी है, इन सब के साथ ही लेखको ने सरकार पर भी प्रहार कर अपना विरोध जताया  है। ऐसे में इन लेखकों से सवाल पूछना लाजमी होता है कि क्या उनके पुरस्कार लौटने से देश में हिंसा, साम्प्रदायिकता जैसी घटनाए रुक जाएगी ? इन सब के बीच यह भी सवाल उठ रहे है कि पुरस्कार लौटाने के पीछे का मतलब कहीं व्यक्ति विशेष का विरोध तो नही ? क्योकि जिन तर्को का सहारा देकर ये लेखक पुरस्कार लौटा रहे उस पर भी सवाल उठ रहे है और सवाल उठाने वाले और कोई नही उन्ही के साथी लेखक हैं।

जिन लेखकों ने देश कि वर्तमान परिस्थिति की दुहाई देकर पुरस्कार लौटाए हैं उन लेखकों से सवाल पूछना लाजमी है कि ये पुरस्कार उस समय क्यों नही लौटाए गए जब देश में सिक्ख दंगे ,गुजरात दंगे ,मुजफ्फरपुर दंगे हुए थे और जब देश में आपत्काल कि घोषणा हुई थी, उस समय तो पूरी तरह अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगा दी गयी थी या जब कलबुर्गी जैसे लेखको कि हत्या हुई थी ? अगर लेखकों को सरकार की नीतियों और देश के वर्तमान वातावरण से आपत्ति है तो वह अपनी कलम का प्रयोग तलवार की भांति कर सरकार का आलोचना करें और पुरस्कार लौटा दे। पुरस्कार लौटा कर लेखक सरकार का नही साहित्य अकादमी का विरोध कर रहे हैं, यह बात लेखकों को समझनी होगी कि साहित्य अकादमी कोई सरकारी संस्था नही है अपितु एक स्वायत संस्था है, फिर पुरस्कार लौटाने का क्या आधार है ? शायद इन लेखकों को पता होगा कि इन पुरस्कारों के लिए नाम प्रस्तावित करने के पीछे कई लेखकों का योगदान होता है इसीलिए वह पुरस्कार लौटा कर न केवल संस्था बल्कि उन सभी लेखकों की भावनाओ को भी आहत कर रहे  हैं।

इन पुरस्कार को लौटाने वाले लेखकों की मंशा पर भी सवाल उठ रहे है, हाल ही में मुनव्वर रना ने जिस जोर-शोर के साथ पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी, आज उतनी ही नरमी से कहा कि अगर पीएम चाहेंगे तो वह अपना पुरस्कार वापस लेने पर विचार कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं न कहीं ये लेखक अपने को खबरों में बनाये रखने के लिए तो ऐसा कर रहे हैं ? इसके पीछे यह कारण भी बताया जा रहा है कि लेखक देश में बिगड़े हालत का विरोध न करके केवल एक पार्टी एवं शख्स का विरोध करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

अंत में हम कह सकते हैं कि —

लेखकों को अपना विरोध करने का अपना पूरा हक है पर पुरस्कार लौटा कर विरोध करने का कोई औचित्य नजर नही आता है अगर उन्हें विरोध ही करना है तो कलम से विरोध करें। पुरस्कार लौटाने से न तो परिस्थिति बदलने वाली है न ही सरकार बदलने वाली है इसलिए अगर लेखकों को विरोध करना है तो वह अपनी लेखनी से विरोध करें। इतिहास गवाह है कि लेखकों की कलम ने बड़े -बड़े सत्ता परिवर्तन किए हैं।विरोध का भी अपना तरीका होता है बस समझना होगा कि उचित तरीका क्या है।

ये कैसा विरोध




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