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बिहार चुनाव |आखिर किन कारणो से हुई हार?

बिहार चुनाव |आखिर किन कारणो से हुई हार ?

जिस चुनाव पर पूरे देश कि नजर टिकी थी आखिर कार उसका नतीजा आ गया, और नतीजे आये तो सबकी उम्मीदों से परे। नतीजो ने अच्छे से अच्छे अनुमानो को झुठला दिया। चुनाव बाद जिस तरह ओपिनियन पोलों मे कांटे की टक्कर का अनुमान लगाया जा रहा था, पर परिणाम उसके एकदम उल्टे आये। चुनाव के बाद जहाँ महागठबन्धन को दीपावली मनाने का मौका मिला वहीं दूसरी तरफ राजग को आत्मचिन्तन का अवसर मिला। बिहार चुनाव मे जहां महागठबन्धन 178 सीटें मिली वहीं राजग को 58 तो अन्य को 7 सीटों से ही सन्तोष करना पड़ा। चुनाव नतीजो ने एक बार फिर भाजपा को आत्ममथंन की परिस्थिति मे लाकर खड़ा कर दिया हैं । आखिर क्या कारण रहें जिसने राजग को हार और महागठबन्धन को जीत का उपहार दिया ?

 

पहला कारण

अगर पहले कारण पर ध्यान दे तो देखा जा सकता हैं कि राजग के पास स्थानीय नेताओं का अभाव था, जिसका लाभ महागठबन्धन ने उठाया और बिहारी बनाम बाहरी का नारा दिया। स्थानीय नेताओ के अभाव में जनता की विश्वसनीयता राजग के साथ न होकर महागठबन्धन के साथ रहीं, जिसके अधिकांश नेता स्थानीय नेताओ की छवि मे थे।

 

दूसरा कारण

दूसरा कारण था राजग नेताओं की बयानबाजी और मोहन भागवत का आरक्षण सम्बन्धी बयान जिसने बहुत हद तक हवा का रूख बदलने का काम किया। राजग के नेताओ ने जिस तरह बयान दिया कि जैसे

अगर भाजपा हार जाती है तो पाकिस्तान मे पटाखे फूटेगें या फिर वी.के.सिंह का कुत्ता वाला बयान हो या फिर गौमांस पर

उन सभी बयानो को महागठबन्धन ने अपने पक्ष मे प्रयोग करके राजग को सामप्रदायिक पार्टी के रूप मे प्रस्तुत करने मे काफी हद तक सफलता प्राप्त कर ली। जिसका खामियाजा राजग को हार के रूप मे उठाना पङा। राजग नेताओं के बयानो को हथियार बनाकर महागठबन्धन ने राजग को आरक्षण विरोधी साबित करने का भरसक प्रयास किया और सफल भी हुए। पीएम से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भले ही आरक्षण को लेकर कितने भी आश्वासन दिये हो पर वे जनता का विश्वास नहीं जीत पाये और आरक्षण विरोधी छवि मे सुधार न कर सके ।

तीसरा कारण

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तीसरा कारण था चुनाव प्रचार का तरीका। इस बार चुनाव प्रचार के लिये महागठबन्धन ने जहां लोकसभा मे मोदी के कैंपेनर रहे प्रशान्त किशोर के तरीके का प्रयोग किया वहीं भाजपा ने सारा भार नरेन्द्र मोदी पर ङाल दिया था। राजग के सारे नेता जहां नरेन्द्र मोदी की रैलियो मे जाने के उत्सुक रहते थे वहीं महागठबन्धन के नेता लालू और नीतिश अलग –अलग ही लेकिन सब जगह घूम–घूम कर और घर-घर जाकर चुनाव प्रचार करने का प्रयास किया तो भाजपा जुमले और ख्याली पुलाव ही बनाती रह गयी ।

चौथा कारण

चौथा कारण सीटों के बटंवारे मे गड़बड़ी। भाजपा ने जिस तरह सहयोगी दलों पर भरोसा कर के उन्हे सीटें दी सहयोगी दलों ने उसकी तुलना मे वह परिणाम नहीं दिया, जिसकी आशा की जा रही थीं। सीटों के लिये होहल्ला मचा रहे मांझी अपनी पारम्परिक सीट तो बचा न सके और साथ ही उनकी पार्टी के अध्यक्ष भी चुनाव हार गये। ऐसे मे भाजपा ने उम्मीद से ज्यादा सीटें देकर राजग के सहयोगियो पर अतिविश्वास कर लिया, वहीं दूसरी तरफ महागठबन्धन ने सीटों का जिस अनुपात मे बटंवारा किया उसे उसका परिणाम भी मिला। चुनाव की रेस मे सबसे पीछे दिखने वाली काग्रेंस ने भी उम्मीद से बढ़कर परिणाम दिखाया। इस तरह सीटों के बटंवारे की कमजोरी एंव दूरदर्शिता का अभाव राजग के लिये हार का बड़ा कारण बन गया

पांचवा कारण

पांचवा कारण आपसी फूट थी। कहा भी जाता हैं कि घर का भेदी लंका ढाये , भाजपा के हार के लिये यह कहावत एकदम सटीक बैठती हैं। जिस तरह अरूण शौरी, शत्रुध्न सिन्हा, आरके सिंह ने अपने बयानो से पार्टी की किरकिरी कराई थी और पार्टी के अनुशासन की धज्जिया उडा़ई थी, उसने जनता के सामने पार्टी की छवि बहुत खराब की थी। पार्टी की तरफ से नेताओ के इन बयानो पर बिना कोई कायर्वाही ने पार्टी की हार मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वहीं दूसरी तरफ महागठबन्धन ने प्रत्येक चरण मे अनुशासन का परिचय दिया चाहे वे जेडीयू नेता पर घूस का आरेप ही क्यो न लगा हो। इस कार्यावही से जनता के बीच तुलनात्मक रूप से अपनी छवि बेहतर बनाई ।bpj

इस चुनाव मे भाजपा को हराने मे जितना योगदान बाहरी तत्वो का नहीं था उससे कहीं ज्यादा आन्तरिक तत्वो का और पार्टी की अपनी कमजोरी का था। खैर अगर भाजपा अभी इन कमजोरियो से सबक नहीं सीखती तो आने वाले समय मे अन्य राज्य के विधानसभा चुनाव मे विशेष तौर पर यूपी चुनाव मे परिणाम अच्छे नहीं होगे।




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