बिहार

हाल -ए-बिहार !

बिहार में विधानसभा चुनाव कि घोषणा हो चुकी है और अब तक दो चरणो का चुनाव भी खत्म हो चुका है। ऐसे में अब तक भी किसी राजनीतिक दल और पत्रकारों को ठीक से समझ नही आ रहा है कि बिहार में होने वाले चुनाव में जनता किस आधार पर वोट देगी। इस बार बिहार में विधानसभा चुनाव पांच चरणो में होने वाले है, जिसमे से अभी तक दो चरणो का मतदान हो चुका है। इस बिहार में मुकाबला चौतरफा है। एक और जहाँ महागठबंधन है, जिसमे आरजेडी, जदयू, कांग्रेस है वहीं दूसरी तरफ एनडीए है जो एक -दूसरे को कड़ी टक्कर देती दिखाई दे रही है, लेकिन इस चुनाव में इन दो बड़ी पार्टियो के अतिरिक्त तीसरा मोर्चा और ओवैसी की पार्टी भी चुनाव लड़ रही है। इन दोनों पार्टियो के चुनाव लड़ने से वोटो का बँटना तय है (ध्रुवीकरण होना पक्का माना जा रहा है )। अगर बिहार के ज़िलों कि बात करे तो ३८ जिलो में से २९ कम या ज्यादा नक्सलग्रस्त ज़िले हैं। बिहार में जातीकार्ड खेलना औपचारिकता नही बल्कि अब अनिवार्यता बन गयी है,ऐसे में अगर जीतना है तो बाँटना है,यहाँ जाती ही सत्ता की चाभी लगती है। बिहार चुनाव के शुरुआत में जहां सभी पार्टियो ने कहा कि वे विकास के नाम पर ही चुनाव लड़ेंगी, वहीं पार्टियां पहले चरण का मतदान तक पहुँचते-पहुँचते विकास के मुद्दे को छोड़ कर जाति  के मुद्दे पर चुनाव लड़ने लगी है। इस चुनावी बिगुल में बात मुद्दों से शुरू हो कर बयानबाज़ी पर ही सिमट गयी…अब ऐसे में बयानों की उल्टियाँ ही देखने को मिल रही है…कोई शैतान कहता है, तो कोई ब्रह्मपिशाच एक दूसरे से बयानों में आगे निकलने में होड़ लगी हुई है, ऐसे में क्या आम नागरिक तय कर सकते है की ये सबसे बड़ा लोकतंत्र के नेता है जिन्हें हम अपना भविष्य उनके हाथो में देंगे। इस बार के चुनाव पर ध्यान दे तो देखेंगे कि किसी भी पार्टी के नेता ऐसे नहीँ है जिन्होंने कोई विवादित बयान नही दिया हों।

 

Featured Photo: Ranjeet Kumar via http://www.thehindu.com/